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 क्या भारत चीन से युद्ध के लिए तैयार है ? चीन के धोखे के बाद भारत की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा ? | dharmpath.com

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क्या भारत चीन से युद्ध के लिए तैयार है ? चीन के धोखे के बाद भारत की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा ?

June 21, 2020 7:35 pm by: Category: सम्पादकीय Comments Off on क्या भारत चीन से युद्ध के लिए तैयार है ? चीन के धोखे के बाद भारत की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा ? A+ / A-

भारत के 20 सैनिकों की निर्मम ह्त्या से भारत और चीन के संबंधों में एक न मिटने वाला अवरोध खड़ा हो गया है ,कोरोना जैसी महामारी का जनक चीन जहाँ वैश्विक स्तर पर व्यापार में भारत सहित कई देशों को अपना गुलाम बना चुका है वहीँ वह स्वयं भी आर्थिक गिरावट से दो – चार हो रहा है ,चीन की अर्थव्यवस्था कोरोना संकट से चरमरा गयी है ,व्यापार अन्य देशों की के पाले में सरक गया है ,अधिकाँश देश जिसमें अमरीका मुख्य है चीन का दुश्मन बन गया है.

भारत की राजनीति पड़ोसी देशों को दुश्मन और दोस्त बना कर राज करने की चल रही है ,जहां पाकिस्तान में मुसलमान अधिकता में हैं अतः उसे दुश्मन बताना आसान है और पाकिस्तान वह कार्य कर भी रहा है वहीं चीन से मित्रता की नीति पर चीन ने बट्टा लगा दिया है और नेपाल को अपने से मिलाकर भारत का बड़ा दुश्मन साबित हुआ है.

हमें यह जानना होगा की आखिर चीन अपनी मशहूर क्रान्ति के बाद जब सन 1048 में आजाद हुआ तब से उसका सफर कैसा रहा ,दुनिया कोउससे क्या आशाएं थीं और चीन ने क्या दिया ?

जब चीन में क्रांति हो रही थी उस दौरान उसे विश्व की जनता का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था। उस समय चीन के बारे में कहा जाता था कि वहां के निवासी अफीम का नशा करके सुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं। उस समय चीन की आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर थी कि कहा जाता था कि वहां का नागरिक बोरे में भरकर नोट लेकर बाजार जाता था और उसके एवज में एक पुड़िया माल लेकर घर आता था। चीन को इस स्थिति से उबारने में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी और उसके महान नेता माओत्से तुंग का प्रमुख योगदान था।

अंततः 30 साल के सतत संघर्ष के बाद चीन बाहरी और भीतरी प्रतिक्रियावादी तत्वों के चंगुल से मुक्त हुआ। चीनी क्रांति का महत्त्व अकेले चीन के लिए नहीं था वरन् दुनिया की समस्त शोषित-पीड़ित जनता के लिए था। चीनी क्रांति क्या थी और वह कैसे दुनिया और विशेषकर एशिया की शक्ल बदल देगी इस बात का संदेश एक अमेरिकी पत्रकार और लेखक ने पहुंचाया। उन्होंने एक किताब लिखी जिसका शीर्षक था ‘‘रेड स्टार ओवर चाइना’’।

सन् 1948 में चीन आजाद हुआ। उसकी आजादी का जश्न हमने भी मनाया। चीन के आजाद होने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक शिष्ट मंडल चीन भेजा था। इस शिष्ट मंडल का नेतृत्व तपस्वी सुंदरलाल ने किया था। इस शिष्ट मंडल में भोपाल के लोकप्रिय नेता शाकिर अली खान और ब्लिटज के संपादक आर. के. करांजिया भी शामिल थे। जब चीन में क्रांति हो रही थी उस दौरान भी हमने डॉक्टरों की एक टीम चीन भेजी थी। इस टीम के नेता डॉ कोटनिस थे।

कम्युनिस्ट शासन स्थापित होने के बाद नेहरूजी ने चीन से दोस्ताना संबध बनाए। प्रगाढ़ संबंधों के चलते ‘‘हिन्दी चीनी भाई-भाई’’ का नारा बहुत लोकप्रिय हुआ। नेहरूजी का सपना था कि भारत और चीन मिलकर दुनिया की शोषित जनता को साम्राज्यवादियों के चंगुल से मुक्त कराएंगे। दोनो देशों ने मिलकर दुनिया के नव-आजाद देशों को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया। इस प्रयास को औपचारिक रूप इंडोनेशिया के बांडुग नगर में दिया गया। नेहरूजी की पहल पर आयोजित हुए इस सम्मेलन में देशों के संबंध कैसे रहें इसके लिए एक रणनीति तैयार की गई। इस रणनीति को ‘पंचशील’ का नाम दिया गया।

इसी बीच भारत और चीन के बीच सीमा से जुड़े विवाद उभरने लगे। इन विवादों को सुलझाने के लिए वार्ताओं के अनेक दौर हुए परंतु मामले सुलझ नहीं सके। सीमा के सवाल पर चीन ने अत्यंत संकुचित रवैया अपनाया। इस दौरान चीन पूरी तरह एक अति राष्ट्रवादी देश बन गया। हम लोग जो चीन के आदर्शों से प्रभावित थे निराश होने लगे। हमें अपेक्षा थी कि चीन वैसी ही भूमिका अदा करेगा जैसी सोवियत संघ ने क्रांति के बाद अदा की थी। सोवियत संघ ने यूरोप के अलावा एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका महाद्वीपों के देशों की आजादी के आंदोलनों में मदद की थी।

नेहरू जी को गांधी और पटेल सहित सभी लोग एक विजनरी नेता मानते थे। चीन से हुए युद्ध को लेकर नेहरूजी की भारी आलोचना की गई। उनकी आलोचना करते हुए कुछ लोगों ने अपमानजनक भाषा का उपयोग भी किया। लोकसभा में बहस के दौरान एक सांसद ने उन्हें गद्दार तक कह डाला। चीन ने हमें तो धोखा दिया ही, उसने पाकिस्तान, जो लगभग पूरी तरह से अमेरिका के गुलाम है, से भी हाथ मिलाया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी चीन से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के भरसक प्रयास किए। यदि चीन ने उन्हें भी धोखा दिया तो उनके विरूद्ध भी ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए जो नेहरू और तत्कालीन रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन के विरूद्ध की गई थी। एक कहावत है कि ‘‘धोखा देने से धोखा खाना बेहतर है।’’ इस समय आवश्यक यह है कि पूरा देश एक होकर इस चुनौती का सामना करे। स्थिति सामान्य होन पर ही उन कारणों का विश्लेषण किया जाए जिनके चलते सीमा पर विवाद उत्पन्न हुआ।

चीन नए-नए हथकंडे अपना कर भारत को परेशान करने में लगा हुआ है, लेकिन जब तक भारत चीन से हर मोर्चे पर दो-दो हाथ करने में सक्षम नहीं होता, तब तक उसके लिए चीन के साथ उलझना ठीक नहीं होगा. यह चीन ही है जिसकी वजह से नीतिनिर्धारक मानने लगे हैं कि भारत को अमेरिका, जापान, और आस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाना जरूरी है. हाल ही में हुआ भारत-आस्ट्रेलिया वर्चुअल शिखर सम्मेलन इसी का प्रमाण है. बैठक में सामरिक और सैन्य क्षेत्र से जुड़े कई मुद्दों पर सहयोग को मंजूरी दी गयी. अमेरिका, जापान, और आस्ट्रेलिया के साथ क्वाड्रिलैटरल सहयोग की मजबूती हो या चतुर्देशीय मालाबार युद्धाभ्यास – इन दोनों मुद्दों पर अब देश के नीति-निर्धारकों में आम राय बनती दिख रही है.

आर्थिक मोर्चे पर, खास तौर पर निवेश और 5G तकनीक के मुद्दे पर चीन का बहिष्कार प्रासंगिक है और संभवतः सार्थक भी. इसके लिए देश में बने उत्पादों और तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की जरूरत होगी. दुनिया के तमाम देश आज ऐसे फैसले ले रहे हैं. जिस तरह चीन अपने आक्रामक रवैए से अमेरिका, ब्रिटेन, ताइवान, आस्ट्रेलिया, वियतनाम, और जापान जैसे देशों को दुश्मनी की ओर धकेल रहा है उससे साफ है कि चीन जल्द ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने के करीब है. भारत के लिए यह जरूरी है कि अपनी सामरिक क्षमता को तेजी से बढ़ाए और चीन के काले कारनामों की ओर दुनिया का ध्यान व्यवस्थित ढंग से आकर्षित करे. सर्वदलीय बैठक के बाद इन मामलों पर देश की तमाम पार्टियों का एक मत बनना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा.

गलवान और सिक्किम में हुई घटनाओं के बाद सीमा पर तैनात अधिकारियों के बीच लेफ्टिनेंट जनरल और मेजर जनरल के स्तर पर हुई बैठकें नाकाम रही. बातचीत और सुलह समझौते का काम राजनयिकों का है और यह कमान उनके और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के जिम्मे सौंपना ही बेहतर है. यह काम हो भी रहा था. 5-6 मई को पैनगोंग-सो घटना के बाद विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला ने भारत में चीन के राजदूत सुन वेइडांग से बातचीत की. खबरों की मानें तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने चीनी विदेश मंत्री यांग जेइची से भी बात की और इस हफ्ते विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने भी विदेश मंत्री यांग जेइची से फोन पर बातचीत में में भारत का रुख स्पष्ट किया. हालांकि बातचीत के इस सिलसिले का कोई सकारात्मक नतीजा सामने आना बाकी है.

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर मीडिया के रोल को भी कम करके नहीं आंका जाना चाहिए. पिछले कुछ वर्षों में अपने प्राइम-टाईम कार्यक्रमों को सनसनीखेज बनाने की कवायद में भारतीय मीडिया ने आचार-व्यवहार के किसी मानदंड का कोई सम्मान नहीं किया है. वायरल वीडियो, अपुष्ट खबरों और निरर्थक वाद-विवाद से इसने सरकारों पर अनावश्यक दबाव ही बनाया है. इस बार भी ऐसा ही हो रहा है. मीडिया को इन घटनाओं की जानकारी जिम्मेदाराना तरीके से देनी चाहिए.

चौतरफा आलोचना और दबाव ने भारत सरकार को इस दबाव में डाल दिया है कि सरकार जल्दी और प्रभावपूर्ण तरीके से कोई बड़ा कदम उठाए. शुक्रवार की सर्वदलीय बैठक भी संभवतः इसी का नतीजा है.

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