गुड़गांव, 5 मार्च (आईएएनएस)। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शनिवार को कहा कि भारतीय बैंकों की वित्तीय हालत सुधारना सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में से एक है। जब भी उनकी पूंजी बढ़ाने की जरूरत होगी सरकार उनमें पैसा डालेगी। उन्होंने यह भी कहा कि कर्जदारों को बख्शा नहीं जाएगा।
जेटली ने यहां दो दिवसीय ‘ज्ञान संगम’ कार्यक्रम में कहा, “अगर अधिक धन की जरूरत होगी तो हम और संसाधनों की तलाश करेंगे।” इस सम्मेलन में बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के शीर्ष अधिकारी, केंद्रीय बैंक नेतृत्व और प्रमुख नीति निर्माता हिस्सा ले रहे हैं।
उन्होंने कहा कि सरकार नई दिवालिया कानून ला रही है जिससे बैंकों को कर्जदारों से कर्ज वसूलने में आसानी होगी। इसके अलावा कर्ज वसूली प्राधिकरण जोकि देश की पहला ऑनलाइन अदालत होगी, की स्थापना की जाएगी, ताकि कर्ज वसूली की प्रक्रिया तेज हो।
जेटली ने बजट प्रस्ताव में बैंक समेकन पर एक विशेषज्ञ समूह के गठन की बात कही थी। उन्होंने इस बारे में कहा कि यह उनकी शीर्ष प्राथमिकता है। उन्होंने कहा, “हमें मजबूत बैंकों की जरूरत है। वहां कोई भी कड़ी कमजोर नहीं होनी चाहिए। हमें बैंकों की ज्यादा संख्या की बजाए मजबूत बैंकों की जरूरत है।”
हालांकि एक बैंक यूनियन के अधिकारी ने मंत्री के इस बयान की आलोचना की है। ऑल इंडिया बैंक एम्प्लाई एसोसिएशन (एआईबीईए) के महासचिव सी. एच. वेंकटचलम ने आईएएनएस को फोन पर बताया, “हमें बुनियादी रूप से मजबूत बैंकों की जरूरत है न कि अलग-अलग बैंकों को मिलाकर बड़े बैंक बनाने की। यहां बैंकिंग नेटवर्क के विस्तार की जरूरत है न कि समेकन करने की।”
जेटली ने कहा कि सरकार बैंक कर्मचारियों के लिए इम्प्लाई स्टॉक ऑनरशिप योजना (ईएसओपी) पर विचार कर रही है।
इसके जवाब में वेंकटचलम ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंको के कर्मचारी अपने बैंक के प्रति पहले से ही समर्पित हैं। इसलिए उन्हें रोकने के लिए ईएसओपी लाने की कोई जरूरत नहीं है।
वेंकटचलम ने कहा कि “बैंकों के कर्जदार बख्से नहीं जाएंगे” यह बयान एक मजाक है। जब तक सरकार इसे अपराधिक अपराध घोषित नहीं करेगी, तब तक कुछ बदलनेवाला नहीं है।
वहीं, जेटली के सहायक वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने कहा कि बैंकों का कुल 8 लाख करोड़ रुपये फंसा है, जिसमें पुनर्गठित कर्ज और गैरनिष्पादित संपत्तियां शामिल हैं।
सिन्हा ने कहा कि बैंकों को कर्जदारों के साथ चर्चा करके तय करना होगा कि कितना वे एनपीए (गैर निष्पादित परिसंपत्ति) में डालेंगे और कितने का निष्पादन हो पाएगा।
हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गर्वनर एस. एस. मुद्रा ने कहा था कि बैंको की फंसी हुई रकम पिछले साल 15 सितंबर तक उनकी कुल पुंजी का 17 फीसदी था, जबकि मार्च 2013 में यह 13.4 फीसदी थी। यह लगभग 10 लाख करोड़ रुपये है।