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 पर्यावरण–प्रदूषण के शिकार लाखों लोग | dharmpath.com

Friday , 4 April 2025

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पर्यावरण–प्रदूषण के शिकार लाखों लोग

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्वास्थ्य के लिए सबसे हानिकारक रासायनिक पदार्थों की सूची प्रकाशित की है| एस्बस्टस, बेंज़ीन, कैडमियम, आर्सेनिक, पारा, सीसा तथा अन्य कई पदार्थ इस सूची में शामिल हैं| वायु के सामान्य प्रदूषण का इसमें अलग से उल्लेख किया गया है| विश्व स्वास्थ्य संगठन यह स्वीकार करता है कि उद्योग के विकास के वर्तमान स्तर पर इन हानिकारक रसायनों के उपयोग से पूरी तरह इनकार कर पाना संभव नहीं है, परंतु अपने रोज़मर्रा के जीवन में विषाक्त पदार्थों से अपनी अंतर्क्रिया हम कम कर सकते हैं|7HIV-budding-Color

पर्यावरण आज मनुष्य की जान ले रहा है| प्लास्टिक की बनी चीज़ें, हार्ड बोर्ड का फर्नीचर, सौंदर्य प्रसाधन, पेय जल, खाद्य पदार्थ – हर वस्तु में रसायन भरे हुए हैं| इनमें कुछ तो लाभदायक हैं या कम से कम शरीर को नुक्सान नहीं पहुंचाते| लेकिन ज़्यादातर रसायनिक पदार्थ विषैले हैं जो हर साल संसार भर में दसियों लाख लोगों के रोगों या मृत्यु का कारण बनते हैं|

एस्बस्टस को ही लीजिए| यह प्राकृतिक पदार्थ अत्यंत पतले रेशों से बना होता है| इसकी सुदृढ़ता इस्पात से भी अधिक है, यह पानी में नहीं घुलता, दूसरे रसायनों से इसकी कोई प्रतिक्रया नहीं होती, सौर विकिरण, ओज़ोन और ऑक्सीजन का इस पर कोई असर नहीं पड़ता| इसलिए मशीन-निर्माण उद्योग में और सड़कें बनाने में इसका इस्तेमाल होता है, इसके पाइप बनाए जाते हैं और इमारतों की बाहरी सज्जा के लिए टाइलें भी| लेकिन इसके रेशे हवा के रास्ते मनुष्य के शरीर में पहुंच कर सदा के लिए वहीं रह जाते हैं और फिर इनसे फेफड़ों, गले और अंडकोषों का कैंसर होता है|

बीसवीं सदी के अंत में संसार भर में यह अभियान चला कि एस्बस्टस का प्रयोग निषिद्ध घोषित किया जाए| आज अमरीका, आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, जापान और यूरोपीय संघ में इसके उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लग चुका है| दूसरे देशों में केवल लंबे रेशे वाले एस्बस्टस के उपयोग की अनुमति है जिससे कैंसर होने का खतरा कम है| लेकिन पुरानी सड़कें तो कोई नहीं बदल रहा, पुरानी इमारतें भी नहीं कोई तोड़कर नई बना रहा| यहां से छोटे रेशे वाला एस्बस्टस लोगों की सेहत को नुक्सान पहुंचा रहा है|

विश्व स्वास्थ्य संगठन की सूची से एक और उदाहरण है – भारी धातुएं| लोग इनके हानिकारक प्रभाव के बारे में अरसे से जानते हैं| तो भी इनका व्यापक उपयोग जारी है, विशेषज्ञ इरीना इल्चेंको कहती हैं:

“भारी धातुएं एक बार शरीर में पहुच जाने पर लंबे समय तक वहीं बनी रहती हैं, इसलिए वे अति-विषैली मानी जाती हैं| सीसा और कैडमियम ऐसी ही धातुएं हैं| कैडमियम का सबसे अधिक दुष्प्रभाव गुर्दे पर और मूत्र-विसर्जन प्रणाली पर पडता है| और सीसा तो सांद्रता कम होने पर भी स्नायुतंत्र और मानसिक विकास को धीमा करता है| गर्भधारण, जन्म तथा शैशव काल में इसका खास प्रभाव पड़ता है| बेशक, वयस्क लोगों पर भी ऐसा प्रभाव पडता है|”

सीसे की कोई ऐसी सांद्रता नहीं है जिसे मनुष्य के लिए निरापद कहा जा सकता है| इसकी कोई भी मात्रा अत्यंत खतरनाक है| यह श्वास के रास्ते भी और त्वचा से भी मानव-शरीर में प्रवेश करता है| ऐसा होने पर भी हम आज तक सीसे की चीज़ों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जैसे कि सोल्डर, छापाखाने में टाइप-सैट, और सिरेमिक के बर्तनों पर चमकीली परत| पुरानी इमारतों की दीवारें भी खतरनाक हो सकती हैं| आजकल तो सीसे के आधार पर पेंट बनाने की मनाही हो चुकी है, लेकिन कुछ समय पहले तक ऐसे पेंट बहुत प्रचलित थे| अब अगर आप किसी पुराने मकान में रहते हैं जिसकी मरम्मत करके दीवारों पर नया पेंट किया गया है तो सीसे वाले पेंट की निचली परतों से विषाक्त पदार्थों का निकलना जारी है|

कैडमियम का इस्तेमाल कार और इन्वर्टर बैटरियों में होता है| पारा हमारे थर्मामीटरों और ऊर्जा-बचत लैम्पों में है| जब तक वह कांच में बंद है तब तक तो निरापद है| लेकिन टूट जाए तो मुसीबत ही मुसीबत है| सारा पारा जमा कर लीजिए, सब कुछ धो लीजिए, फेंक दीजिए, तो भी ऐसे स्थान पर दो महीने तक रहना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है|

अब ऐसी भी जानकारी आने लगी है कि जिन रसायनों को पहले मनुष्य के लिए लाभदायक माना जाता था उनका भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| उदाहरण के लिए, फ्लुओरीन| शरीर में इसकी थोड़ी सी मात्रा का सुप्रभाव पड़ता है – दंतक्षय (कैरियस) रोग बहुत कम होता है| यह बात वैज्ञानिकों ने प्रमाणित कर दी तो बस सभी टुथपेस्टों और माउथ-वाशों में फ्लुओरीन डालने लगे, यही नहीं पानी और दूध तक में इसे मिलाने लगे| अब इसका उलटा असर हुआ| शरीर में फ्लुओरीन की मात्रा अधिक हो तो इससे दांत ही नहीं, सारा अस्थि-पंजर खराब होता है| दिलचस्प बात यह है कि फ्लुओरीन की जिन मात्राओं से ऐसे एकदम विपरीत प्रभाव पड़ते हैं, उनके बीच भेद बहुत कम है|

या फिर क्लोरीन को लीजिए| यह तो जाना-माना तेज़ जहर है| प्रथम विश्व युद्ध में ज़हरीली गैस के तौर पर इसका इस्तेमाल हुआ था| साथ ही यह अनेक रोगाणुओं को भी मारती है, इसलिए इसकी मदद से पानी की सफाई की जाने लगी| हैजा और आंत-रोगों की महामारियां तो बहुत कम हो गईं| लेकिन, किसी भी अन्य रासायनिक तत्व की ही भांति क्लोरीन की भी दूसरे तत्वों से प्रतिक्रया होती है, जिसके परिणाम प्रायः दुखद होते हैं| उदाहरण के लिए अगर जल में एनिलीन है और ऐसे जल में क्लोरीन मिलाई जाती है तो इन दोनों तत्वों से 11 नए यौगिक बनाते हैं जिनमें से छह कैंसरजनक और म्यूटेशनकारी हैं| 1980 के दशक के अमरीकी आंकड़ों के अनुसार ही देश की आबादी में कैंसर-रोगों की वृद्धि में 5 – 15% योगदान जल की क्लोरीन-शुद्धि के कुप्रभाव का ही है|

सर्वाधिक हानिकारक पदार्थों की सूची प्रकाशित करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोई समाधान नहीं सुझाया है| कहने की आवश्यकता नहीं कि अनेक रासायनिक पदार्थों ने हमारे जीवन में अपना गहरा स्थान बना लिया है और जब तक उनका कोई समुचित विकल्प नहीं खोज लिया जाता तब तक उनका उपयोग बंद करना असम्भव है| हां, हम अपने दैनंदिन जीवन में विषाक्त पदार्थों से अंतर्क्रिया जहां तक हो सके घटा सकते हैं| उदाहरण के लिए, सौंदर्य प्रसाधनों और घरेलू इस्तेमाल के रसायनों के लेबलों को ध्यान से पढ़ें और यदि उनमें कारगर किंतु हानिकारक पदार्थ हैं तो उनका इस्तेमाल न करें|

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