भोपाल- भारत में प्रत्येक 12 वर्ष में आयोजित होने वाले महाकुंभ जीवन में आध्यात्मिक चेतना जगाने का जरिया है। हमें समाज में व्याप्त महाकुंभ के परम्परागत अर्थों से निकालकर इसे वैचारिक महाकुंभ में परिवर्तित करने की आवश्यकता है। हमारा देश भारत का नामकरण भा&भाव] र&राग एवं त&ताल से मिलकर बना है। देश के नामकरण में विलीन इन्हीं अर्थों को समाहित करते हुए व्यक्ति को अपना जीवन जीना चाहिए। यह विचार आज मध्यप्रदेश विधानसभा सभागार में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संविमर्ष “मूल्य आधारित जीवनशैली” के उद्घाटन सत्र में बोलते हुए ईशा फाउंडेशन के अध्यक्ष सदगुरु जग्गी वासुदेव महाराज ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि हिमालय एवं हिन्द महासागर के बीच रहने वाले लोग हिन्दू हैं और यही हमारी भौगोलिक पहचान है। अपनी भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए इस धरती के लोगों ने अभूतपूर्व विकास किया है और जीवन के छिपे रहस्यों को ढूँढ़ निकाला। आज आर्थिक विकास की चकाचौंध के सामने हम अपनी आध्यात्मिक ताकत को भूल चुके हैं। महाकुंभ इन्हीं आध्यात्मिक चेतनाओं के पुर्नजागरण का एक जरिया है। महाकुंभ जिन क्षेत्रों में सम्पन्न होते हैं वे वैज्ञानिक दृष्टि से ऊर्जा के क्षेत्र रहे हैं। कुंभ स्थानों पर नदियों की धाराओं के मिलने से जो ऊर्जा मिलती है वह मनुष्य में आंतरिक चेतना का विकास करती है। भारत विज्ञान एवं आध्यात्म का सम्बन्ध जोड़ने वाला देश रहा है। हमारे देश के संतों और गुरुओं ने कड़ी तपस्या से सुख और आनंद का जो मार्ग ढूँढ़ा है इसका मूल आधार योग है। लोगों को आज यह जानना बहुत जरूरी है कि हम प्रकृति से प्राप्त शक्तियों का उपयोग किस तरह करें। जब तक हम अपने जीवन में आध्यात्मिक विकास नहीं लाते हैं तब तक मानव आंतरिक शांति को प्राप्त नहीं कर सकेगा।
उन्होंने मध्यप्रदेश सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि विगत वर्षों में मध्यप्रदेश ने अभूतपूर्व प्रगति की है। पहले मध्यप्रदेश की पहचान एक बीमारू राज्य के रूप में थी परन्तु आज प्रदेश में हो रहे विकास कार्यों से राज्य की इस पहचान से बाहर आया है। उन्होंने मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में हो रहे कार्यों की सराहना की। कुंभ के आयोजन से पूर्व प्रारम्भ हुए इस वैचारिक महाकुंभ की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि ईशा फाउंडेशन सरकार के इस कार्य में अपना पूरा सहयोग करेगा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सुख एवं आनंद को बताने का मार्ग गुरुओं एवं संतों का रहा है। महाकुंभ के परम्परागत अर्थों से निकलकर समाज के समक्ष एक वैचारिक एवं वैज्ञानिक पक्ष प्रस्तुत करने की दृष्टि से यह वैचारिक महाकुंभ प्रारम्भ किया गया है। सिंहस्थ से पूर्व आगे भी ऐसे आयोजन किए जाएँगे। आज प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय तथा सार्वजनिक जीवन में मूल्यों का तेजी से पतन हुआ है। इन वैचारिक अनुष्ठानों के माध्यम से यह प्रयास किया जाएगा कि लोगों में मूल्यनिष्ठता पैदा की जाए साथ ही एक आध्यात्मिक चेतना भी विकसित हो सके।
परिसंवाद में दुसरे दिन 18 अप्रैल 2015 को मूल्य आधारित विद्यालयीन शिक्षा, मूल्य आधारित उच्च एवं व्यवसायिक शिक्षा, जनसंचार माध्यमों एवं सूचना प्रौद्योगिकी में मूल्योन्मुखता, मूल्य आधारित शासन एवं प्रशासन व्यवस्था, न्याय एवं विधि क्षेत्र में मूल्यनिष्ठता, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में मूल्योन्मुखता, चिकित्सा सेवाओं में मूल्यनिष्ठा, वृत्तिगत (प्रोफेशनल) जीवन में मूल्यनिष्ठता, सार्वजनिक जीवन में मूल्यनिष्ठता तथा मूल्यों की सार्वभौमिकता विषयों पर समानांतर सत्र होंगे।
परिसंवाद के विभिन्न सत्रों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष श्री वेदप्रकाश, प्रख्यात शिक्षाविद श्री दीनानाथ बत्रा, श्री जे.एस.राजपूत, मध्यप्रदेश सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव श्री हरिरंजन राव, जस्टिस डी.एम.धर्माधिकारी, डा. एच.आर.नागेन्द्र, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. कपिल कपूर, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव श्री अतुल कोठारी, माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बृज किशोर कुठियाला, वरिष्ठ पत्रकार श्री उमेश उपाध्याय, श्री श्यामलाल यादव समेत अनेक विद्वान अपने विचार रखेंगे।