वाराणसी: शास्त्रार्थ की प्राचीन परंपरा बनारस में फिर जीवंत होगी. काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद ने इसके लिए पहल की है. यह आयोजन हर महीने किया जाएगा. शुरुआत दिसंबर से ही कर दी जाएगी. इसमें विद्वतजन धर्म शास्त्र, कर्मकांड और प्रथाओं समेत विभिन्न बिंदुओं पर मंथन करेंगे. विद्वानों व न्यासियों की रायशुमारी से निकला निष्कर्ष शासन को भेजा जाएगा.
परिषद अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने शुक्रवार को पत्रकारों को बताया कि अखिल भारतीय विद्वत परिषद व काशी विद्वत परिषद से विचार विमर्श किया गया है. अन्य धार्मिक संस्थाएं भी सहयोग के लिए तैयार हैं.
शास्त्रर्थ के लिए विद्वत जन हर माह एक से 15 तारीख तक अस्सी स्थित कैंप कार्यालय में नाम, पता, संपर्क नंबर और विषय दर्ज करा सकेंगे. विद्वानों की सहमति से ही बिंदुवार विषय, तिथि व स्थल तय होगा. उद्देश्य होगा भावनात्मक व क्रियात्मक सुधार. तर्कों को ग्रंथों की कसौटी पर भी कसा जाएगा. निष्कर्ष शासन को भेज कर तद्नुरूप परिवर्तन व परिवर्धन किया जाएगा.
उन्होंने कहा कि आज विद्वता दब रही है और धार्मिक व्यापार फल फूल रहा है. इसे व्यवसाय बनाकर हम धार्मिक नहीं कहे जा सकते. काशी में अध्यात्म व भौतिकता दोनों ही चरम पर हैं जबकि दैविक दोष भी बढ़ा हुआ है.
शास्त्रार्थ के निष्कर्षो के आधार पर ही देवालय आचार संहिता ‘श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर पद्धति’ तैयार की जाएगी ताकि दुनिया इसका अनुकरण करे. आचार्य द्विवेदी ने कहा कि काशी संत, महंत और विद्वानों की नगरी है और हमें किसी अन्य की नकल करने की आवश्यकता नहीं.