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 आधुनिक राजनीति और अंबेडकर का दलित विमर्श- 14 अप्रैल जयंती | dharmpath.com

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आधुनिक राजनीति और अंबेडकर का दलित विमर्श- 14 अप्रैल जयंती

April 13, 2015 6:25 pm by: Category: फीचर Comments Off on आधुनिक राजनीति और अंबेडकर का दलित विमर्श- 14 अप्रैल जयंती A+ / A-

images (1)भारतीय राजनीति और सामाजिक बदलाव के संदर्भ में हम डॉ. भीमराव अंबेडकर को विस्मृत नहीं कर सकते, लेकिन हमारे इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि ऐसी वैचारिक और सामाजिक संचेतना की विभूतियों को हमने सिर्फ संग्रहालयों और खास दिवसों में समेट कर रखा है।

भारतीय राजनीति और सामाजिक बदलाव के संदर्भ में हम डॉ. भीमराव अंबेडकर को विस्मृत नहीं कर सकते, लेकिन हमारे इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह रही है कि ऐसी वैचारिक और सामाजिक संचेतना की विभूतियों को हमने सिर्फ संग्रहालयों और खास दिवसों में समेट कर रखा है।

बाबा साहब भीमराव अंबेडकर भारतीय राजनीति के बदले संदर्भ में दलित राजनीति के प्रतीक बन कर रह गए हैं। हमने उनके सामाजिक संघर्षो को सतही मायने में नहीं स्वीकार किया। शायद हमारे वर्तमान की इतिहास से सबक न लेने सबसे बड़ी भूल है।

हमारे समाज ने उनके जीवन दर्शन को पूर्णरूप से आत्मसात नहीं किया। उनकी उपयोगिता के बजाय भारतीय समाज ने उनका उपयोग किया। यह हमारे लिए चिंतन और चिंता का विषय है। उनकी स्वीकार्यता सिर्फ राजनीतिक और प्रतीकात्मक है।

सामाजिक अस्पृश्यता को खत्म करने और समता मूलक समाज की स्थापना करने में हम असफल रहे हैं। हमने उनके जीवन दर्शन को व्यापक स्वीकार्यता के रूप में नहीं लिया। देश की वर्तमान दलित मसीहायी राजनीति उनकी सर्व ग्राहयता पर अधिक चोट पहुंचाती है। सामाजिक बदलाव केलिए यह सबसे बड़ा खतरा साबित हुई।

अंबेडकर को हमने समाजवादी न बनाकर व्यक्ति और जातिवादी जंजीरों में बांध दिया। जिस उद्देश्य से उन्होंने अपने सामाजिक संघर्ष की शुरुआत की थी, उसे अस्वीकार कर दिया गया। उसकी दिशा को ही मोड़कर नई परिभाषा गढ़ दी गई। उस विचारधारा को निहित स्वार्थ की सीमा में घसीट राजनीतिक चोला पहना दिया गया। जहां सारे उद्देश्य अर्थहीन हो जाते हैं। जिस परिवर्तन की जंग उन्होंने शुरू की थी उसके संदर्भ अब बदल गए हैं, लेकिन उसकी मूल भावना आज भी कायम हैं। उन्हें वर्ण व्यवस्था से अधिक तकलीफ थी।

वे इस नासूर को खत्म करना चाहते थे। उनके विचार में समतामूलक समाज की स्थापना में वर्णव्यवस्था सबसे बड़ी बाधा थी। हलांकि उसे खत्म नहीं किया सका जा सका। लेकिन सामाजिक अस्पृश्यता पर निश्चित तौर पर जीत पाई जा सकी है। समय के साथ इस जीत के अर्थ भी बदल गए हैं।

अंबेडकर हिंदूधर्म से अधिक चोटिल होने के कारण ही उन्होंने बौद्धधर्म स्वीकार किया और बौद्ध आंदोलन के प्रणेता के रुप में भी उन्हें जाना जाता है। समाज के दबे कुचलों के हिंतसंरक्षण लिए उन्होंने राजनैतिक स्वतंत्रता और सामाजिक बराबरी की वकालत किया। बौद्ध भिक्षुओं ने उन्हें बोधिसत्व की उपाधि दी।

दलितों को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की पैरवी की। उनके सामाजिक बदलाव से प्रभावित होकर कोल्हापुर के शासक शाहू चतुर्थ ने उनके साथ भोजन किया। जिससे रुढ़िवादी समाज के सिपहसालारों में बहस छिड़ गई।

सामाजिक बदलाव और उसकी यथार्थता के खिलाफ उन्होंने सर्वांगीण लड़ाई लड़ी। समाज की मुख्यधारा से कटे लोगों को शिक्षित करने के लिए बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना किया।

यह संस्था दलितों के शैक्षणिक विकास और सामाजिक उत्थान के लिए काम करती थी। 1926 में मुंबई विधासनसभा का सदस्य मनोनीत होने के बाद 1927 सामाजिक बदलाव के लिए बड़ा आंदोलन चलाया, जिसकी मूल विचारधारा में दलितों को ऊंची जातियों के मध्य उचित सम्मान और भागीदारी दिलाना था, जिसमें हिंदू मंदिरों, जलाशयों और सार्वजनिक स्थानों पर दलितों का प्रवेश और उपयोग मुख्य सोच थी।

डा. भीमराव अंबेडकर समाज से रूढ़ियों और समाज में फैली वैचारिक विकलांगता को जड़ से खत्म करना चाहते थे। उन्होंने न सिर्फ दलितों के लिए ही बल्कि सामाजिक असमानता के शिकार दूसरों के लिए भी संघर्ष किया। द्वितीय आंग्ला मराठा युद्ध में कारेगांव की जंग में मारे गए भारतीय सैनिकों के सम्मान के लिए समारोह आयोजित कर शहीद सैनिकों के नाम शिलालेख पर अंकित कराया।

उनकी योग्यता को देखते हुए अंग्रेजी हूकूत ने 1928 में साइमन कमीशन में काम करने का अवसर दिया। कमीशन में काम करने वाले अंबेडकर के अलवा सभी अंग्रेज अफसर थे। उस दौरान इस कमीशन का भारत में तीखा विरोध हुआ था। साइमन कमीशन गो बैक के नारे भी लगे थे। उनकी तरफ से चलाए जा रहे सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को लेकर उन्हें काफी पीड़ा सहनी पड़ी। कांग्रेस और गांधी की ओर से इसकी तीखी वैचाकिरक आलोचना भी झेलनी पड़ी। दलित उत्थान के संदर्भ में गांधी की विचारधारा से भीमराव अंबेडकर सहमत नहीं थे। इस आंदोलन में उन्हें अंग्रेजी हूकूत और कांग्रेस की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं थी।

1930 में आयोजित शोषित वर्ग सम्मेलन में अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा था कि “हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना होगा। राजनीतिक शक्ति शोषितों की समस्याओं का निवारण नहीं हो सकती। उनका उद्धार समाज में उनका उचित स्थान पाने से निहित है। दलितों को रहने का तरीका बदलना होगा। शिक्षित होना चाहिए। दलितों की एक सबसे बड़ी समस्या है उनकी हीनता। यह सबसे बुरा है इसे बदलना होगा।”

गांधी जी के कई आंदोलनों और विचारधारओं से वे सहमत नहीं थे। शुरुआत में उनकी ओर से महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह आंदोलन का विरोध किया गया था। इस कारण कांग्रेस और उसके कई नेताओं के विचार में अंबेडकर को अलोकप्रिय बना दिया था। सामाजिक संघर्ष की लड़ाई और आम लोगों में बढ़ती जनप्रियता के कारण अंग्रेजी शासन की निगाह में भी उनकी दखल बढ़ने लगी थी।

वर्ष 1931 में लंदन में आयोजित दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उन्हें आमंत्रित किया गया था। वहां उन्होंने अस्पृश्यों के लिए अलग से निर्वाचिका की मांग की थी, लेकिन इस प्रस्ताव का गांधी जी ने कड़ा विरोध किया था। उन्होंने आशंका जताई थी कि उनकी यह मांग भारतीय संदर्भ में उचित नहीं है। इससे हिंदू समाज और उसकी आने वाली पीढ़ी को विभाजन का दंश झेलना पड़ेगा।

गांधी जी अंग्रेजों की तरफ से स्वीकृति मिलने के बाद ही पुणे की यरवदा केंद्रीय जेल में अनशन शुरू किया था। गांधी संपूर्ण हिंदू समाज की एकता की बात करते थे। जबकि अपने ही समाज में उपेक्षित दलितों के जीवन संघर्ष और सामाजिक दीनता को देखते हुए बाबा साहब उन्हें खुली हवा के हिमायती थे।

भारी दबाब के चलते आखिकर का उन्हें अपनी यह मांग वापस लेनी पड़ी। अंत में यह बात आरक्षण पर आकर खत्म हुई। आरक्षण की सुविधा वे लंबे वक्त तक नहीं चाहते थे। उनकी चाहत थी की यह अधिकतम 20-25 सालों तक रहे। लेकिन पहली बार इसे सिर्फ पांच साल के लिए लागू किया गया था। भीमराव के विचार में ज्योतिबा राव फुले गांधी के बजाय असली महात्मा थे।

हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था ने उन्हें इतनी अधिक चोट पहुंचाई कि उन्होंने अपनी धर्मपत्नी रमाबाई को पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल पंढरपुर नहीं जाने दिया। उनके विचार में जिस तीर्थ स्थलों पर उन्हें जाने से रोका जाता है, यानी दलितों को अछूत माना जाता है, वहां जाने का क्या अभिप्राय निकलेगा।

नासिक के करीब उन्होंने एक सभा में धर्म परिवर्तन की इच्छा जाहिर की थीं। 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टी का गठन किया। उस दल ने 1937 के केंद्रीय विधानसभा चुनाव में 15 सीटों पर विजय हासिल किया। इसी साल अपनी पुस्तक जाति का विनाश प्रकाशित कराई।

यह न्यूयार्क में लिखे उनके एक शोधपत्र पर अधारित थी। महात्मा गांधी और कांग्रेस की ओर से दिए गए हरिजन शब्द की तीखी आलोचना की थी। उनके विचार में कांग्रेस और गांधी का दलित प्रेम भावनात्मक था। उनके विचार में इससे बदलाव की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।

दलितों के लिए वे मुक्त व्यस्था के हिमायती थे, जबकि इससे हिंदू समाज के बंटने का खतरा था। इसका लाभ अंग्रेज भारत को तोड़ने में करते। मुस्लिम समाज में व्याप्त बाल विवाह और समाज में महिओं के प्रति हो रहे अत्याचार के खिलाफ भी उन्होंने आवाज उठाई। वे मानते थे कि मुस्लिम समाज में हिंदू समाज से भी अधिक बुराइयां हैं। महिलाओं के लिए पर्दा प्रथा का भी घोर विरोध किया।

अंबेडकर मुस्लिम लीग की नीतियों के आलोचक थे। हिंदूओं और मुसलमानों के विभाजन को सही माना था, क्योंकि वे जानते थे कि जातिय राष्टवाद के चलते स्थितियां सांप्रदायिक संघर्ष को जन्म देंगी। यह दोनों संप्रदाय के लिए सबसे बुरी स्थिति होगी, जबकि विभाजन के बाद भी इस समस्या का हल नहीं हुआ।

स्वाधीन भारत की कांग्रेसी सरकार के वे पहले कानून मंत्री बने। उन्होंने संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामाजिक समरता कायम करने के लिए उन्होंने समाज के दबे-कुचले लोगों की बराबरी के लिए संवैधानिक और कानूनी अधिकार भी प्रदान किया। संविधान के बारे में अपनी राय प्रगट करते हुए कहा था कि देश का संविधान लचीला और काम करने लायक हैं। यह इतना मजबूत है कि देश को शांति और युद्ध दोनों समय जोड़ कर रख सकता है। इसके गलत उपयोग की स्थिति में संविधान के बजाय उपयोग करने वालो को दोषी ठहराया जाएगा।

1951 में हिंदू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। आजीवन वे राज्यसभा सदस्य बने रहे। दीक्षाभूमि नागपुर में उन्होंने बौद्धधर्म अपना लिया। बाद में वे श्रीलंका भी गए।

दिल्ली स्थित आवास पर 6 दिसंबर 1956 को इनका निधन हो गया। अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में हुआ था। 1990 में इन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

उनका नारा था- शिक्षित बनो, संगठित रहो संघर्ष करो। भारतीय समाज के बदले संदर्भोंे परं बाबा साहब बोधिसत्व डा. भीमराव रामजी अंबेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा है। हम उनके जीवन दर्शन और संघर्ष को कुछ शब्दों में नहीं बांध सकते हैं।

वे एक कुशल अधिवक्ता, कानूननविंद, शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ, संविधान निमार्ता, लेखक, संपादक और साांजिक आंदोलन के मसीहा थे। सामाजिक बदलाव और दलित जागृति में उनकी भूमिका शीर्षस्थ हैं। लेकिन आधुनिक भारतीय राजनीति की दलित विमर्श की धारा में अंबेडकर केवल प्रतीक मात्र हैं।

यह संपूर्ण भारतीय राजनीति और दलित समाज सुधाकरों के लिए बड़ी चुनौती है। सिर्फ प्रतीकों के सहारे सामाजिक परिवर्तन की बात बेमानी है। (आईएएनएस/आईपीएन)

(लेखक प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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