02 मार्च 2014 | विश्व संवाद केंद्र भोपाल द्वारा आज नवोदित पत्रकारों के लिए “फिल्म पत्रकारिता – फिल्म निर्माण” विषय पर “राष्ट्रीय कार्यशाला” का आयोजन किया गया| इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्द फिल्म निर्देशक योगेन्द्र चौबे ने जहाँ फिल्म निर्माण प्रक्रिया से विद्यार्थियों को रूबरू कराया, वहीं फिल्म समीक्षा की पद्धति और सार्थकता को प्रसिद्द फिल्म समीक्षक अनिल चौबे द्वारा रेखांकित किया गया ।
वरिष्ठ फिल्म समीक्षक प्रो. अनिल चौबे ने कहा कि फिल्म एप्रीसिएशन फिल्म की व्यापक समझ है। सिनेमा जीवन का चित्रण है, यह मनोरंजन का नहीं अभिव्यक्ति का माध्यम है। फिल्में जीवन को दिशा देने वाली होन चाहिए। उन्होंने कहा कि फिल्म लेखन में चित्रों का समन्वय अधिक और डायलॉग कम होना चाहिए।
सिनेमा की भाषा में डायलॉग जीवन की भाषा जैसे होने चाहिए। गीत के माध्यम से भावनाओं को अभिव्यक्त भारतीय परंपरा में किया जाता है। इसी का अनुसरण फिल्मों में किया गया है। उन्होंने कहा कि फिल्मों में अनावश्यक गानों का प्रयोग नहीं होना चाहिए, गानों का प्रयोग कथानक की मांग के अनुरूप किया जाना चहिए। मिश्रा ने कहा कि फिल्म का माध्यम एक दृश्य कला है। फिल्म में साहित्यक कहानी पर फिल्मांकन अधिक होता है। फिल्में चित्रों के सतत् प्रवाह की भाषा है। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रायोगिकता में फिल्म की स्वभाविकता बनी रहना चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के डॉ. मान सिंह परमार ने कहा कि विधार्थी फिल्म की भाषा और व्याकरण को गहराई से समझें और विभिन्न रचनात्मक एवं संवेदनशील विषयों पर फिल्म बनाए । प्रातः 10 बजे से डिपो चौराहा स्थित “छात्र शक्ति भवन” में हुई इस कार्यशाला से वे छात्र लाभान्वित हुए जो फिल्म निर्माणऔर फिल्म पत्रकारिता में व्यावसायिक उपकरणों का उपयोग करते हैं तथा पहले दिन से फिल्म निर्माण शुरू करना चाहते हैं ।
इस कार्यशाला का उद्देश्य विद्यार्थियों को सिनेमा की ताकत और गंभीरता से परिचित कराना था । कार्यशाला में सिनेमा शिक्षण के द्वारा सिनेमाई भाषा की नई सोच से भी मीडिया क्षेत्र के विद्यार्थियों को रूबरू कराया गया ।
दिनभर चलने वाली कार्यशाला के दौरान वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा, बंसल न्यूज़ चैनल के संपादक शरद द्विवेदी और माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पुष्पेन्द्र पाल सिंह प्रमुख रूप से उपस्थित थें ।