भारत-पाकिस्तान के बीच विदेश सचिव स्तर की वार्ता में ‘शांति का संदेश’ लेकर आने का दावा करने वाले पाकिस्तानी विदेश सचिव जलील अब्बास जिलानी ने अपने तयशुदा एजेंडे के अनुसार भारत में जिहादी आतंकवाद का जहर फैलाने में पाकिस्तान की किसी भी तरह की भूमिका को तो नकारा ही, इस संबंध में अबू जुंदाल द्वारा दी गई जानकारी व तथ्यों को भी ठुकरा दिया। यह कैसा शांति का संदेश है? क्या भारत की सरकार को अब भी पाकिस्तान की भारत के प्रति नफरत की भावना पर कोई शक है, जो वह बार-बार ऐसी ही हरकतें सामने आने के बाद भी निरर्थक वार्ताओं का दौर चलाने के प्रति उत्सुक रहती है? आखिर भारत में विध्वंस के अनेक सबूतों के बावजूद पाकिस्तान के नकार को हम कब तक बर्दाश्त करते रहेंगे?
वार्ता के लिए आए पाकिस्तानी विदेश सचिव ने वार्ता से पहले ही कश्मीर के अलगाववादी नेताओं से मुलाकात कर अपने ‘शांति के संदेश’ की कलई खोल दी। इसे इन अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तानी शह के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इसके बाद ही घाटी के पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने कश्मीर में आतंकवादी हालात के लिए भारतीय एजेंसियों को जिम्मेदार ठहरा दिया, क्योंकि जलील ने कहा कि इसमें पाकिस्तानी एजेंसियों का हाथ नहीं है। जबकि दुनिया जानती है कि कश्मीर में जिहादी आतंकवाद पाकिस्तानी सरकार, सेना व आईएसआई की मिलीभगत का नतीजा है। भारत पर दबाव बनाने का जलील का यह पैंतरा नया नहीं है। पिछले वर्ष विदेश मंत्री स्तर की वार्ता के लिए भारत आईं पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार ने भी वार्ता से पहले यही हरकत की थी और उन्होंने कश्मीर के अलगाववादियों से भेंटकर उनकी पीठ थपथपाई थी। पाकिस्तान का ‘कश्मीर राग’ भारत के विरुद्ध पुराना हथियार है, जिसे वह मूल मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए हर बार इस्तेमाल करता है। आश्चर्य है कि भारत सरकार इन षड्यंत्रों की अनदेखी करती है। वह यह कहने की हिम्मत क्यों नहीं दिखाती कि वार्ता से पहले ऐसी हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और अब वार्ता नहीं होगी।
खार के समय वार्ता से पहले कश्मीर के अलगाववादियों से हुई उनकी मुलाकात पर यदि भारत सरकार ने यह रुख दिखाया होता तो अब पाकिस्तानी विदेश सचिव यह दुस्साहस नहीं दिखा सकते थे। लेकिन भारत के नरम रवैये और घुटनाटेक नीति के कारण ही पाकिस्तान एक के बाद एक मक्कारी करता जाता है। आखिर ऐसी वार्ताओं से भारत को हासिल क्या होता है? पाकिस्तान तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर इन वार्ताओं को अपनी ‘संवाद के द्वारा समाधान’ की कोशिशों के रूप में निरूपित करता है, लेकिन भारत यह दबाव क्यों नहीं बनाता कि पाकिस्तान की हरकतों के चलते हम वार्ता नहीं करेंगे? अबू जुंदाल का रियासत अली के नाम से पाकिस्तानी पासपोर्ट आईएसआई ने बनवाया, अबू जुंदाल के अनुसार मुम्बई हमलों के बाद पाकिस्तान पर कार्रवाई का दबाव बढ़ने पर वहां की सरकार और सेना ने तय किया कि अब जुंदाल का पाकिस्तान में रहना ठीक नहीं, इसलिए आईएसआई के सहयोग से उसका पासपोर्ट बनवाकर उसे सऊदी अरब भेज दिया गया। इतना ही नहीं, उसका पाकिस्तानी पहचान पत्र भी आईएसआई ने बनवाया। कश्मीर घाटी से लेकर पूरे भारत में जिहादी आतंकवाद को पालने-पोसने और उसके खूंखार तरीके से पैर फैलाने की प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका के अनेक प्रमाण हैं, लेकिन कसाब और अबू जुंदाल तो इसके जीते-जागते सबूत बन गए हैं, जिन्हें पाकिस्तान लगातार नकार रहा है और हम हर बार उसके नकार पर मौन रह जाते हैं। भारत की सुरक्षा एजेंसियां लगातार चेता रही हैं कि देश में कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, उ.प्र., तमिलनाडु, प.बंगाल और बिहार में आतंकवादियों ने मजबूत नेटवर्क बना लिया है और भारत में फिर मुम्बई जैसे हमले की आशंका है। जुंदाल ने भी अपनी साजिश का खुलासा करते हुए यह स्वीकार किया है, तब पाकिस्तान के साथ कड़ाई से पेश आने की बजाय वार्ताओं की औपचारिकता निभाते रहना निरर्थक है। पाकिस्तानी विदेश सचिव ने ‘संयुक्त जांच’ की बात कहकर मुम्बई हमलों जैसे मामलों को उलझाने की ही मंशा जाहिर की है, क्योंकि पाकिस्तान तो कभी सही जांच होने ही नहीं देगा, उसे पता है कि जांच हुई तो वह पकड़ा जाएगा। सोचना भारत को है कि उसे कैसे सख्त कदम उठाने चाहिए।साभार-पांचजन्य
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