नई दिल्ली, गोधरा कांड के बारहवीं बरसी की शाम रामविलास पासवान का एनडीए में लौट आना राजनीति में “आया राम, गया राम” का अनुपम उदाहरण है। राजनेता तर्क विद्या के कौशल होते हैं। मनोनुकुल गढ़ा तर्क कभी चौंकाने वाला तो कभी हंसाने वाला होता है। इसबार पासवान ने आने का रास्ता दलितों के प्रति एनडीए की निष्ठा को बनाया। उन्होने बताया कि यूपीए के शासन में दलितों की समस्याओं का निदान उस रफ्तार मे नहीं हुआ जितना कि एनडीए शासन काल में हुआ था।
समाजवादी आंदोलन की उपज रामविलास पासवान की राजनीतिक समझ अद्भूत है। 1989 से शुरू हुई गठजो़ड़ की राजनीति में पासवान चुनाव से पहले पाला बदलते रहे हैं। जब जिसकी ओर गए महीने दो महीने बाद उसकी सरकार बनती नजर आई। 2002 में यह कोई अनुमान नहीं लगा सकता था कि 2004 में एनडीए का बाजा बजने वाला है। लोकजनशक्ति पार्टी के नेता पासवान पहले राजनेता रहे, जो गुजरात दंगों के तत्काल बाद एनडीए को बाय बाय टाटा करके निकल गए थे। उसके बाद ही एनडीए की नाव से राजनीति के यात्रियों के उतरने का सिलसिला शुरू हुआ। आखिरकार नाव डूब गई। यूपीए की सरकार बनाने से पहले तक कांग्रेस को यकीन नहीं था कि वो इंडिया शाइनिंग को धता बता पाएगी। यूपीए-2 में चुनाव हार जाने की वजह से पासवान सरकार में शामिल नहीं हो पाए। और लगातार खुद को सम्हालने और संवारने में उलझे रहे। बड़ी मुश्किल से लालू प्रसाद की दया पर राज्यसभा पहंचकर राजनीति में डूबती नैया को बचा पाए। वरना नीतीश कुमार ने महादलित का कार्ड फेंककर ठोस इंतजाम कर रखा था कि पासवान की मेनस्ट्रीम राजनीति में पुनर्वापसी न हो पाए।
इस लिहाज से नीतीश का एनडीए छोडकर जाना बुजुर्ग हो रहे पासवान के लिए वरदान साबित हुआ। रामविलास पासवान के ये लिए वनवास का यह वक्त स्वास्थ्य के लिहाज से अच्छा नहीं रहा। बाइपास सर्जरी करनी पड़ी और डाक्टरों की सलाह पर सक्रियता को कम करना पड़ा। नीतीश के एनडीए छोडने से बिहार की राजनीति में नई हवा बही। सात महीने के अंदर में गुजरात दंगों का हवाला देकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों का दिल जीतने की प्रतिद्वंदिता में इस जन्म में बीजेपी का दामन न थामने की शपथ खाने वाले पासवान एनडीए की नाव में सवार होने में सफल रहे।
धर्मनिरपेक्षता के प्रति कट्टर सोच की राजनीति करने वाले पासवान के बारे में साफ है कि इसबार उनका बीजेपी से गलबहियां करना पुत्र मोह की वजह से हुआ है। समाजवादी साथी मुलायम की तरह वह जीते जी पुत्र चिराग पासवान को राजनीति में स्थापित कर देना चाहते हैं। दिलचस्प है कि इस काम में वह लालू यादव से जल्दी सफल होते दिख रहे हैं। लालू प्रसाद को अपनी पार्टी के अंदर के विरोध की वजह से पुत्र तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव के राजनीति में बढते पैर को वापस खिंचने पड़े है। जबकि पासवान ने बीजेपी के करीब आने से पहले अपनी पार्टी को दूसरे नंबर के नेता के तौर पर 31 साल के पुत्र चिराग पासवान को स्थापित कर दिया था। पासवान परिवार की राजनीति करने वाले पुरोधा समाजवादी नेता हैं। पहले भी उनकी पार्टी दो छोटे भाईयों के आसरे चलती रही है। पार्टी में पुत्र को आगे करने के लिए पार्टी के दूसरे नेताओं को मनाने के बजाए पासवान को अपने भाईयों से सहमति लेने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ी होगी।
आम युवा की तरह चिराग पासवान बीजेपी के एग्रेसिव प्रचार के शिकार नजर आते हैं। बताते हैं कि उनका ही दबाव था जो पासवान को कांग्रेस से विमुख होकर बीजेपी की ओर आना पड़ा। बिहार बीजेपी में नई पीढी के नेताओं का अकाल नजर आ रहा है। शाहनवाज, राजीव प्रताप रूढी और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता पैंतालीस-पचास की उम्र सीमा पार कर चुके हैं। ऐसे में बिहार की राजनीति में चिराग के लिए खुली जमीन मिल पाने की संभवना बढी है। यूपीए में रहते वक्त जाहिर तौर पर इस जमीन पर लालू प्रसाद के बच्चों का पहला हक होता और चिराग को उनसे प्रतियोगिता करनी पड़ती।